फसल विविधीकरण बना आर्थिक समृद्धि का आधार
रायपुर : खेती में समय के साथ बदलाव अपनाने का साहस कई बार ऐसी सफलता की कहानी लिख देता है, जो दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन जाती है। सक्ती जिले के मालखरौदा विकासखंड के ग्राम दिमानी के प्रगतिशील किसान दाऊ लाल ने भी कुछ ऐसा ही किया। वर्षों तक ग्रीष्मकालीन धान की खेती करने के बाद उन्होंने कृषि विभाग की सलाह पर उड़द की खेती अपनाई और कम समय में अधिक उत्पादन तथा बेहतर आय हासिल की।
दाऊ लाल के पास कुल 4.5 एकड़ कृषि भूमि है। पहले वे ग्रीष्मकालीन धान की खेती करते थे, जिसमें अधिक सिंचाई, बढ़ती लागत और मिट्टी की उर्वरता में कमी जैसी चुनौतियां सामने आती थीं। कृषि विभाग के दलहन, तिलहन एवं मक्का फसल प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत उन्होंने 2.5 एकड़ में कोटा उड़द-04 किस्म की बुवाई की। महज 70 दिनों में फसल तैयार हुई और उन्हें 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ।
उड़द की खेती में लगभग 22,500 रुपये की लागत आई, जबकि फसल बेचकर करीब 1.10 लाख रुपये की आय हुई। यानी कम लागत में अधिक लाभ मिला। सबसे बड़ी बात यह रही कि धान की तुलना में सिंचाई के लिए बहुत ही कम पानी आवश्यकता पड़ी। साथ ही कीट एवं रोगों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम रहा, जिससे खेती का जोखिम और खर्च दोनों घट गए।
दाऊ लाल का कहना है कि उड़द की खेती कम पानी, कम लागत और कम समय में बेहतर मुनाफा देने वाली फसल है। इस सफलता के बाद उन्होंने भविष्य में भी फसल चक्र अपनाते हुए दलहनी फसलों का रकबा बढ़ाने का निर्णय लिया है। कृषि विभाग के अनुसार जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और किसानों की आय बढ़ाने के लिए ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहन, तिलहन और मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसानों को उन्नत बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी भी लगातार उपलब्ध कराई जा रही है। बदलते समय में परंपरागत खेती आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके और फसल विविधीकरण अपनाने से न केवल किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि जल और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकता है।

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