यूपी चुनाव से पहले AIMIM का बड़ा प्लान, ओवैसी के दांव से किसे होगा फायदा और किसे नुकसान?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों के मद्देनजर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की बढ़ती सक्रियता ने प्रमुख विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ओवैसी जिस तरह से प्रदेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, उससे चुनावी समीकरणों में बड़े उलटफेर की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी यह रणनीति न केवल सपा-कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है, बल्कि परोक्ष रूप से इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को भी मिल सकता है।
मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ओवैसी का चुनावी अभियान
ओवैसी ने अपने चुनावी अभियान के लिए बहराइच, बिजनौर और सहारनपुर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों को चुना है। बहराइच, जहां मुस्लिम आबादी लगभग 34 प्रतिशत है, वहां ओवैसी की उपस्थिति सपा के पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह, बिजनौर और सहारनपुर जैसे इलाकों में भी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। इन क्षेत्रों में ओवैसी के आक्रामक प्रचार से सपा और कांग्रेस के लिए अपनी चुनावी जमीन बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है, क्योंकि यह दल इन क्षेत्रों में मुस्लिम वोटों पर अपनी मजबूत दावेदारी रखते हैं।
दलित-मुस्लिम गठबंधन और 'जय भीम-जय मीम' का दांव
ओवैसी का पूरा चुनावी गणित 'जय भीम, जय मीम' के नारे के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जिसके माध्यम से वे दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस समीकरण से न केवल सपा-कांग्रेस के सामने मुश्किलें खड़ी हो रही हैं, बल्कि नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक संभावनाओं को भी झटका लग सकता है, जिन्होंने इसी गठजोड़ के दम पर जीत हासिल की थी। ओवैसी की यह सक्रियता बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए भी राहत की खबर हो सकती है, क्योंकि यह चंद्रशेखर जैसे उभरते दलित चेहरों के प्रभाव को सीमित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
चुनावी समीकरण और राजनीतिक नफा-नुकसान
ओवैसी की रणनीति का सीधा प्रभाव मुस्लिम वोटों के विभाजन के रूप में देखा जा रहा है। यदि वे मुस्लिम मतों का एक हिस्सा अपनी ओर खींचने में सफल रहते हैं, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलने की पूरी संभावना है। दूसरी ओर, दलित वोटों में सेंधमारी को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन ओवैसी की उपस्थिति ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ओवैसी का यह 'सीरियस प्लेयर' बनने का दांव यूपी के चुनावी नतीजों में किस हद तक बदलाव लाता है और विपक्षी एकता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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