मध्य प्रदेश में अनाज घोटाले का बड़ा मामला, छिंदवाड़ा के गोदामों से गायब हुआ 44 लाख का गेहूं
छिंदवाड़ा। समर्थन मूल्य पर की गई गेहूं खरीदी में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जहाँ कागजों में दर्ज लगभग 1800 क्विंटल गेहूं सरकारी गोदामों तक पहुँचा ही नहीं। करीब 44 लाख रुपये से अधिक मूल्य के इस अनाज के गायब होने से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि या तो यह गेहूं परिवहन के दौरान रास्ते में ही गायब कर दिया गया या फिर खरीद के नाम पर फर्जीवाड़ा किया गया। नागरिक आपूर्ति निगम ने अब इस पूरे मामले की गहन जांच शुरू कर दी है।
39 समितियों पर लगा लापरवाही का आरोप
गेहूं उपार्जन के दौरान हुई इस भारी अनियमितता में कुल 39 समितियाँ संदिग्ध पाई गई हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन समितियों द्वारा कुल 1,836 क्विंटल गेहूं कम पाया गया है, जिसकी बाजार कीमत 44 लाख 52 हजार रुपये आँकी गई है। वर्ष 2025-26 के उपार्जन सत्र के दौरान जिले में 84 केंद्र बनाए गए थे, जहाँ हजारों किसानों ने अपना अनाज बेचा था। नागरिक आपूर्ति निगम ने अब संबंधित समितियों और परिवहनकर्ताओं को नोटिस जारी कर वसूली की प्रक्रिया तेज कर दी है। निगम के जिला प्रबंधक मुकुल त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि संबंधित पक्षों के कमीशन और बिलों से इस राशि की कटौती की जाएगी।
समितियों के अजीब तर्क और प्रशासनिक खींचतान
इस गंभीर मामले में सहकारिता और नागरिक आपूर्ति विभाग के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। जहाँ नागरिक आपूर्ति निगम ने इसे सीधे तौर पर खरीद और परिवहन के दौरान हुई शॉर्टेज माना है, वहीं कई सहकारी समिति प्रबंधकों ने विचित्र तर्क दिए हैं। उनका दावा है कि अनाज को गोदामों में शिफ्ट करते समय बोरियों के फटने और खुले में भंडारण के कारण नमी सूखने से वजन में कमी आई है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर वजन में कमी को प्रशासन ने केवल तकनीकी समस्या मानने से इनकार किया है और इसे एक सुनियोजित घोटाले के रूप में देखा जा रहा है।
विपक्ष का हमला और सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल
प्रदेश में एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों ने सरकार की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इससे पहले मध्य प्रदेश के चावल घोटाले को लेकर भी भारी राजनीतिक विवाद हुआ था। ताजा मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को निशाने पर लिया है और खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। राज्य में सहकारी समितियों के माध्यम से होने वाली इस तरह की धांधली न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि ईमानदार किसानों के भरोसे को भी चकनाचूर कर रही है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में जिम्मेदार लोगों से वसूली हो पाएगी या मामला केवल फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।

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