सीनियर प्रिंसिपल की याचिका रंग लाई, बिलासपुर प्रभारी DEO की नियुक्ति पर हाई कोर्ट की रोक
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बिलासपुर जिले के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के पद पर की गई नई नियुक्ति पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय का यह आदेश स्कूल शिक्षा विभाग के उस निर्देश को चुनौती देने वाली दो वरिष्ठ प्राचार्यों की याचिका पर सुनवाई के बाद आया है, जिसमें विभाग पर वरिष्ठता के स्थापित नियमों की अवहेलना करने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि विभाग ने अपने ही नियमों को दरकिनार कर एक कनिष्ठ (जूनियर) प्राचार्य को जिले के सर्वोच्च शिक्षा अधिकारी का प्रभार सौंप दिया।
वरिष्ठता को दरकिनार करने का आरोप, 18 वर्ष जूनियर को कमान
बिलासपुर क्षेत्र के वरिष्ठ प्राचार्य राघवेंद्र गौराहा और कामेश्वर बैरागी ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली के माध्यम से उच्च न्यायालय में यह रिट याचिका दायर की है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि जिले में वर्तमान समय में 100 से अधिक ऐसे प्राचार्य कार्यरत हैं, जो नवनियुक्त प्रभारी डीईओ की तुलना में लगभग 18 वर्ष या उससे भी अधिक सीनियर हैं। इसके बावजूद, महकमे ने कुछ महीने पहले ही व्याख्याता से प्राचार्य पद पर पदोन्नत हुए रामेश्वर जायसवाल को इस महत्वपूर्ण पद की कमान सौंप दी।
याचिकाकर्ताओं ने विधि सम्मत तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि राज्य शासन के वर्तमान प्रशासनिक नियमों और सर्कुलर के तहत किसी भी कनिष्ठ अधिकारी को उसके वरिष्ठ अधिकारियों के ऊपर प्रशासनिक नियंत्रण के लिए नियुक्त नहीं किया जा सकता। विशेषकर ऐसी परिस्थितियों में, जहाँ उस जूनियर अधिकारी को अपने से वरिष्ठ अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली (CR) लिखने और उनकी समीक्षा करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त हो जाए।
प्रशासनिक प्रक्रिया और नियमों पर खड़े हुए गंभीर सवाल
न्यायिक प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता जितेंद्र पाली ने पीठ को अवगत कराया कि रामेश्वर जायसवाल को महज छह माह पूर्व ही शिक्षक (एलबी) संवर्ग से पदोन्नत कर प्राचार्य बनाया गया था। इसके तत्काल बाद ही उन्हें बिलासपुर जैसे बड़े जिले का प्रभारी शिक्षा अधिकारी नियुक्त कर दिया गया। उन्होंने दलील दी कि यह निर्णय पूरी तरह से विभागीय नियमावली के विपरीत है और प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
प्राचार्य संघ के विरोध के बाद न्यायालय की शरण में पहुंचे शिक्षक
न्यायालय के समक्ष रखी गई दलीलों में यह भी बताया गया कि इस विवादित नियुक्ति के बाद से ही जिले के शिक्षा जगत और प्राचार्यों में गहरा रोष व्याप्त था। शासकीय प्राचार्य कल्याण संघ ने भी इस प्रशासनिक फेरबदल पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। शासन स्तर पर जब इस विषय में कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तब थक-हारकर पीड़ित पक्षों ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से तलब किया जवाब
मामले की आरंभिक तफ्तीश और प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने इस नियुक्ति प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण माना और प्रभारी DEO की कार्यप्रणाली पर अंतरिम रोक लगा दी। अब उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार राज्य सरकार को कोर्ट में जवाब दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों की उपलब्धता के बाद भी किस विशेष आधार पर एक कनिष्ठ अधिकारी को इतनी बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी गई।

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