काठमांडू: नेपाल के सियासी गलियारों में एक बार फिर बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। सालों तक सत्ता की जंग में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' एक बार फिर नजदीक आ रहे हैं। दोनों दिग्गज नेताओं के बीच लगातार हो रही गुप्त मुलाकातों और चर्चाओं से यह संकेत साफ मिल रहे हैं कि देश में बहुत जल्द वामपंथी दलों का एक नया मोर्चा आकार ले सकता है। ऐसे में हर तरफ यही सवाल गूंज रहा है कि हमेशा एक-दूसरे को पटखनी देने वाले ये दोनों धुरंधर आखिर फिर से हाथ मिलाने को मजबूर क्यों हुए? राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस अप्रत्याशित नजदीकी के पीछे सिर्फ कुर्सी का मोह नहीं, बल्कि नेपाल की तेजी से बदलती सियासी परिस्थितियां और नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का बढ़ता राजनीतिक दबदबा है।

बालेन शाह के खौफ ने पुराने सूरमाओं को किया एकजुट

नेपाल की कमान संभालते ही युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पुराने और पारंपरिक राजनेताओं के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। बालेन शाह की सरकार पुराने दिग्गज नेताओं की गुप्त संपत्तियों और उनके कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की ताबड़तोड़ जांच करवा रही है। इस कार्रवाई ने ओली और प्रचंड की मुश्किलें बेहद बढ़ा दी हैं। दोनों वामपंथी नेताओं को अब यह बखूबी अहसास हो चुका है कि यदि वे अलग-अलग रहे, तो इस नए सियासी बवंडर में उनका वजूद खतरे में पड़ सकता है। इसी बड़ी चुनौती का मुकाबला करने के लिए दोनों ने अपनी पुरानी कड़वाहट भूलकर एकजुट होने का मन बनाया है। हालांकि, अपने पुराने और धोखे से भरे इतिहास को देखते हुए यह गठबंधन आगे कितने दिन टिक पाएगा, इस पर अभी से संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

ओली की चतुराई बनाम प्रचंड का पाला बदलने का इतिहास

गठबंधन की सुगबुगाहट के बीच दोनों नेताओं के पुराने इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। एक बेहद साधारण परिवार से निकलकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय करने वाले केपी शर्मा ओली ने कम्युनिस्ट आंदोलन के दौरान करीब 14 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारे हैं। वह बेहद चालाक, दृढ़ इच्छाशक्ति वाले और अपनी शर्तों पर राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं, जिनकी छवि एक धुर भारत-विरोधी नेता की भी रही है। वहीं दूसरी तरफ, पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' का इतिहास 10 सालों तक हिंसक माओवादी विद्रोह का नेतृत्व करने का रहा है, जो साल 2006 में शांति समझौते के जरिए मुख्यधारा की राजनीति में आए। प्रचंड की छवि आज भी एक ऐसे नेता की है जो फायदे के लिए कभी भी पाला बदल सकते हैं। स्वभाव में इतने विरोधाभास के बाद भी दोनों में एक बात बिल्कुल समान है—सत्ता की चरम भूख, जिसके लिए वे कभी जिगरी दोस्त तो कभी कट्टर दुश्मन बन जाते हैं।

दोस्ती और दगाबाजी का उतार-चढ़ाव भरा पुराना सफर

इन दोनों नेताओं के बीच शह और मात का खेल बेहद पुराना है। साल 2015 में नेपाल का नया संविधान बनने के बाद दोनों समझ चुके थे कि अकेले दम पर सत्ता पाना नामुमकिन है। लिहाजा, ओली और प्रचंड साल 2017 में पहली बार साथ आए और इनके गठबंधन ने रिकॉर्ड दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। तब दोनों के बीच ढाई-ढाई साल के लिए प्रधानमंत्री बनने का गुप्त समझौता हुआ था। लेकिन ओली को सत्ता मिलते ही उन्होंने प्रचंड को हाशिए पर धकेलना शुरू कर दिया, उनके करीबियों को कैबिनेट में तवज्जो नहीं दी और सारे फैसले खुद लेने लगे। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से उनकी एकीकृत पार्टी बिखर गई। इसके बाद साल 2022 के चुनाव में कमजोर पड़ने पर दोनों फिर दो महीने के लिए साथ आए, लेकिन प्रचंड ने महज दो महीने बाद ही नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर ओली को धोखा दे दिया और खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ गए, जिससे दोनों के रिश्तों में भारी कड़वाहट आ गई थी।

मदन भंडारी जयंती पर साझा मंच से शक्ति प्रदर्शन की तैयारी

अब एक बार फिर प्रधानमंत्री बालेन शाह की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों के खौफ से सिर्फ ओली और प्रचंड ही नहीं, बल्कि दोनों पार्टियों के कई बड़े नेता भी एक-दूसरे के संपर्क में हैं। प्रांतीय सरकारों में तालमेल बैठाने, संविधान की दुहाई देने और बालेन शाह के खिलाफ एक साझा चक्रव्यूह तैयार करने पर लगातार माथापच्ची चल रही है। इसी कड़ी में 28 जून को कम्युनिस्ट नेता मदन भंडारी की 75वीं जयंती के मौके पर ओली और प्रचंड लंबे समय बाद एक साथ एक ही मंच साझा करते नजर आएंगे। राजनैतिक पंडित इसे दोनों के बीच जमी बर्फ पिघलने का सबसे बड़ा सबूत मान रहे हैं। यह साझा मंच न केवल उनके कार्यकर्ताओं को कम्युनिस्ट एकता का संदेश देगा, बल्कि वर्तमान बालेन शाह सरकार के लिए भी एक खुली चेतावनी होगी कि आने वाले दिनों में उन्हें संसद से लेकर सड़क तक मिलकर घेरा जाएगा।