दतिया की परंपरा बनी मिसाल, कृष्ण मंदिर के सामने 37 ताजियों ने अदा किया सम्मान
दतिया: मध्य प्रदेश के दतिया जिले के ऐतिहासिक भांडेर कस्बे से गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की एक बेहद खूबसूरत और दिल छू लेने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां मुहर्रम के पवित्र और संवेदनशील अवसर पर सदियों पुरानी एक ऐसी परंपरा निभाई जा रही है, जो आज के दौर में भी देश के लिए सामाजिक समरसता की एक अनूठी मिसाल है। मुहर्रम के जुलूस के दौरान कुल 37 भव्य ताजियों ने शहर के सुप्रसिद्ध और प्राचीन श्री चतुर्भुज नारायण मंदिर के मुख्य द्वार पर रुककर भगवान को पारंपरिक रूप से नमन और सलामी दी। इस पावन मौके पर मंदिर के मुख्य पुजारियों और वहां उपस्थित हिंदू श्रद्धालुओं ने भी आगे बढ़कर अगाध श्रद्धा के साथ ताजियों का स्वागत किया और उन पर फूलमालाएं अर्पित कीं। पिछले दो सौ सालों से निरंतर चली आ रही यह अद्वितीय रीत आज भी दोनों समुदायों के दिलों को जोड़ने का सबसे मजबूत सेतु बनी हुई है।
पारंपरिक मार्ग पर गूंजी सौहार्द की गूंज, श्रद्धालुओं ने किया भव्य स्वागत
स्थानीय प्रशासन और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भांडेर कस्बे में शुक्रवार की रात जब मुहर्रम का मुख्य मातमी जुलूस अपने तयशुदा पारंपरिक रास्तों से गरिमापूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा था, तभी एक बेहद भावुक कर देने वाला क्षण आया। जैसे ही ढोल-ताशों के साथ जुलूस प्रसिद्ध चतुर्भुज नारायण मंदिर के प्रांगण के सामने पहुंचा, वैसे ही अखाड़े के उस्तादों और ताजीदारों ने अपने कदम रोक दिए।
सभी 37 ताजियों को सम्मानपूर्वक मंदिर के गर्भगृह के ठीक सामने कतारबद्ध किया गया और वहां भगवान चतुर्भुज नारायण को पारंपरिक सलामी (एहतराम) पेश की गई। इस पावन दृश्य को देखने के लिए मंदिर परिसर में भारी संख्या में स्थानीय नागरिक मौजूद थे। मंदिर के पुजारियों ने बिना किसी भेदभाव के पूरी आत्मीयता से जुलूस की अगवानी की और ताजियों पर सादर पुष्पवर्षा की।
दो सदियों का गौरवशाली इतिहास, आस्था और भाईचारे का जीवंत संगम
यह विहंगम दृश्य महज एक औपचारिकता या वार्षिक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के रग-रग में बसे आपसी प्रेम, अटूट विश्वास और अखंड सामाजिक एकता का सबसे बड़ा और जीवंत संदेश है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोग बिना किसी झिझक के एक-दूसरे के धार्मिक त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करते हैं।
इतिहासकारों और बुजुर्गों के मुताबिक, भांडेर की यह गौरवशाली परंपरा लगभग दो शताब्दियों (200 वर्ष) से भी अधिक पुरानी है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज के युवा भी इसे पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं।
सोंतलाई तालाब से जुड़ा है मंदिर का इतिहास, मुस्लिम परिवार ने कराई थी स्थापना
क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और जानकारों ने बताया कि इस पावन चतुर्भुज नारायण मंदिर की आधारशिला का इतिहास ही पूरी तरह से हिंदू-मुस्लिम एकता की नींव पर टिका हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले कस्बे के ऐतिहासिक सोंतलाई तालाब की खुदाई और सफाई के दौरान भगवान चतुर्भुज नारायण की एक अत्यंत चमत्कारी और प्राचीन दिव्य प्रतिमा वहां के एक स्थानीय मुस्लिम 'हजारी परिवार' के पूर्वजों को प्राप्त हुई थी।
मूर्ति मिलने के बाद उस मुस्लिम परिवार ने पूरे आदर और पवित्रता के साथ वैदिक रीति-रिवाज से मंदिर की स्थापना करवाई थी। सिर्फ इतना ही नहीं, मंदिर के दैनिक खर्चों, भोग और सुचारू रखरखाव के लिए हजारी परिवार ने अपनी मर्जी से कई बीघा कीमती कृषि भूमि भी मंदिर ट्रस्ट को दान में दे दी थी, जो आज भी मंदिर के नाम पर दर्ज है।
आजादी के पहले का वो किस्सा, जो आज भी दिलों को जोड़ता है
कस्बे के वयोवृद्ध लोग बताते हैं कि देश की आजादी से पहले का एक नियम था कि जब भी मंदिर से भगवान की कोई भव्य रथयात्रा या धार्मिक जुलूस निकलता था, तो वह रथ तब तक आगे नहीं बढ़ता था, जब तक कि हजारी परिवार का कोई मुखिया या वरिष्ठ सदस्य वहां आकर अपनी उपस्थिति दर्ज न करा दे।
इसी परंपरा से जुड़ा एक बेहद मार्मिक संस्मरण आज भी लोगों की जुबान पर है। एक बार इस हजारी परिवार में केवल एक बुजुर्ग महिला ही शेष बची थीं, जो गंभीर बीमारी के कारण चलने-फिरने में पूरी तरह लाचार थीं और बिस्तर पर थीं। परंपरा टूटने के डर से उस समय पूरे कस्बे के हिंदू भाई एकजुट हुए और उन्होंने उस मुस्लिम बुजुर्ग महिला को पूरे सम्मान के साथ पालकी में बैठाकर मंदिर परिसर तक पहुंचाया। महिला द्वारा भगवान को नमन करने और अपना आशीर्वाद देने के बाद ही वह धार्मिक आयोजन आगे बढ़ सका था। यही कारण है कि आज भी जब मुहर्रम पर ताजिए निकलते हैं, तो वे मंदिर के सामने रुककर उस पुराने कर्ज और फर्ज को सलाम करना नहीं भूलते।

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