किसानों के लिए वरदान बना मंडला का सीड बैंक, नहीं पड़ती पैसों की जरूरत
मंडला: रुपये-पैसों के लेनदेन वाले बैंक तो आपने कई देखे होंगे, लेकिन मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके से आत्मनिर्भरता और पुश्तैनी धरोहर को सहेजने की एक बेहद अनोखी तस्वीर सामने आई है। देश की प्रसिद्ध ‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ लहरी बाई के मार्गदर्शन में अब मंडला की ग्रामीण महिलाओं ने विलुप्त हो रहे मोटे अनाजों (मिलेट्स) को बचाने के लिए एक ऐतिहासिक शुरुआत की है, जिसकी गूंज अब देश-दुनिया में सुनाई दे रही है।
पांगरी गांव की महिलाओं ने संभाली कमान
मंडला जिले के बिछिया विकासखंड के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से गांव पांगरी की आदिवासी महिलाओं ने कृषि और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी मिसाल कायम की है। यहां की महिलाओं ने एकजुट होकर ‘कुटकी रानी उत्पादक बीज बैंक कृषक महिला समिति’ की स्थापना की है। यह महज एक बीज बैंक नहीं, बल्कि विलुप्त हो रही पारंपरिक कृषि पद्धति और जैव विविधता को पुनर्जीवित करने का एक महायज्ञ है, जिससे स्थानीय महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं।
बैंक में सुरक्षित हैं 50 से अधिक दुर्लभ देसी बीज
इस पूरी मुहिम की प्रेरणा डिंडोरी के सिलपीड़ी गांव की रहने वाली 36 वर्षीय बैगा आदिवासी महिला लहरी बाई पडिया हैं, जिन्हें पूरी दुनिया ‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ के नाम से जानती है। लहरी बाई ने बिना किसी सरकारी मदद के पिछले डेढ़ दशक में अपने दम पर 150 से अधिक दुर्लभ प्रजाति के मोटे अनाजों का देसी बीज बैंक तैयार किया है। उनके इस अभूतपूर्व काम की सराहना खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर चुके हैं और राष्ट्रपति के हाथों भी उन्हें विशेष सम्मान मिल चुका है। पांगरी गांव की महिलाओं ने इस नए बैंक को समृद्ध करने के लिए शुरुआती दुर्लभ बीज लहरी बाई से ही हासिल किए हैं। आज इस बैंक में 50 से ज्यादा वैरायटी के पारंपरिक बीज मौजूद हैं।
मिट्टी की 'अनाज तिजोरी' में सुरक्षित हैं ये दुर्लभ किस्में
इन अनमोल बीजों को कीड़ों और मौसम की मार से बचाने के लिए इन ग्रामीण महिलाओं ने अपने पारंपरिक और पुश्तैनी ज्ञान का इस्तेमाल किया है। बीजों को सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी की विशेष कोठियां तैयार की गई हैं। आदिवासियों की इस ‘अनाज तिजोरी’ में भुरसा, सफेद कलकी, लाल कलकी, करिया कलकी कांग के साथ-साथ सलहार की तीन किस्में (बैगा, काटा और ऐंठी सलहार) रखी गई हैं। इसके अलावा बड़े, लदरी, बहेरी और छोटी कोदो, चावर, लाल, गोद पारी और मरामुठ मढिया भी सुरक्षित हैं। यही नहीं, भालू, कुशवा और छिदरी जैसी सांभा की तीन प्रजातियां और कुटकी की करीब 11 दुर्लभ किस्में (जैसे बड़े डोंगर, सफेद डोंगर, लाल डोंगर, चार कुटकी, बिरनी, सिताही, नान बाई, नागदावन, छोटाही, भदेली कुटकी और सिकिया) इस बैंक की शोभा बढ़ा रही हैं।
रोजगार और स्वावलंबन के खुलेंगे नए रास्ते
लहरी बाई के इस अनोखे ‘सीड एक्सचेंज’ (बीज विनिमय) फॉर्मूले का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। कुछ किलो बीजों से शुरू हुआ यह सफर अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले रहा है। पांगरी गांव का यह देसी बीज बैंक न केवल दम तोड़ रही पारंपरिक फसलों को जीवनदान दे रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं के लिए रोजगार और स्वावलंबन के नए रास्ते भी खोल रहा है। इन आदिवासी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि बेहतर भविष्य के लिए अपनी जड़ों और मिट्टी की ओर लौटना कितना जरूरी है।

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