लखनऊ: इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ एकजुट होने का दिखावा तो किया गया, लेकिन अंदरूनी तौर पर कांग्रेस और क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच वर्चस्व की जंग साफ नजर आई। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता तेजस्वी यादव ने कांग्रेस, विशेषकर राहुल गांधी को साफ शब्दों में चेतावनी दी कि विपक्षी एकता का वजूद तभी कायम रह सकता है, जब क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक वजूद और उनकी ताकत को पूरा सम्मान दिया जाए।

अखिलेश यादव ने बैठक के दौरान द्रविड़ मुन्नेंत्र कड़गम (द्रमुक) और आम आदमी पार्टी (आप) के शामिल न होने पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सहयोगियों को जोड़े रखने का जिम्मा कांग्रेस का है। उन्होंने इशारा किया कि देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को अपनी सोच बड़ी रखनी होगी और सबको साथ लेकर चलने वाले मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होगी।

उत्तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों से घेरा

सपा प्रमुख ने बैठक में लखनऊ और पूरे उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों का हवाला देते हुए कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों का आईना दिखाया। उन्होंने याद दिलाया कि सपा ने बड़े दिल से कांग्रेस को 17 सीटें सौंपी थीं, जिनमें से कांग्रेस केवल 6 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई। उनका सीधा मतलब था कि गठबंधन को मिली कामयाबी सिर्फ कांग्रेस के खाते की नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय दलों के मजबूत जमीनी कैडर, कार्यकर्ताओं की मेहनत और सामाजिक पकड़ का नतीजा है।

असल में अखिलेश यादव का यह रुख सिर्फ बीते चुनाव का हिसाब-किताब नहीं है, बल्कि लखनऊ की सत्ता के लिए 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी जमीन मजबूत करने की सोची-समझी रणनीति है। समाजवादी पार्टी यह साफ कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी राजनीति का असली चेहरा वही है, और आने वाले समय में सीटों के बंटवारे की कमान उसी के हाथ में रहेगी।

अपनी सियासी ताकत को धार देने में जुटी सपा

पिछले आम चुनाव में 37 सीटें जीतकर समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी ताकतवर पार्टी के रूप में सामने आई थी। सपा आलाकमान का मानना है कि इस जीत की असल वजह उनका मजबूत सामाजिक ताना-बाना और जमीनी नेटवर्क था। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव के बिगुल फुकने से पहले पार्टी लगातार खुद को फ्रंट सीट पर रख रही है।

आंकड़े गवाह हैं कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले दम पर 399 सीटों पर दांव खेला था, लेकिन उसके हाथ महज दो सीटें आई थीं। वहीं, जब वह गठबंधन के साये में आई, तो उसकी किस्मत चमकी और लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला। इसी सियासी हकीकत के दम पर सपा भविष्य की सौदेबाजी की जमीन तैयार कर रही है।

दिखावे की एकजुटता और अंदरूनी दबाव की नीति

इस पूरी उठापटक में सबसे रोचक बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को घेरने का दावा करने वाले ये क्षेत्रीय दल, कांग्रेस को बैकफुट पर धकेलने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार के पटना में राजद और उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस को एक जरूरत तो मानती हैं, लेकिन उसे अपने ऊपर हावी होने देने या दूल्हे की भूमिका में देखने को कतई तैयार नहीं हैं।

यही कारण है कि इस बैठक में अखिलेश और तेजस्वी की जुगलबंदी महज एक इत्तेफाक नहीं थी। इसे आने वाले राज्यों के चुनावों से पहले कांग्रेस को उसकी असली जमीनी हैसियत और क्षेत्रीय ताकतों के रसूख का अहसास कराने वाले एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।